November 16, 2010

Untitled

कोई पहचानी सी दस्तक, कुछ सुनी-सुनाई आवाजें बुला रहीं हैं,
पुरानी पगडंडियों पे चलते-चलते पाँव पे नए छाले पढ़ गए हैं।

Untitled

परसों रात की बची बोतल
और कुछ कही-सुनाई ग़ज़लों के पुर्जे साथ लाया हूँ।
महफ़िल नयी है तोह क्या हुआ, दोस्त
यह चाँद भी सदियों पुराना है
यह ग़म भी बरसों पुराणी है।