कुछ तारों के टुकड़े हाथ में लिए
फिर रहा हूँ कबसे;
मेरी उम्मीद की आखरी निशानी है यह।
नादानियत की भी हद तोह देखो, यारों
टूटते तारों से उम्मीदें बाँधने चला था मैं।
कुछ तारों के टुकड़े हाथ में लिए
फिर रहा हूँ कबसे;
मेरी उम्मीद की आखरी निशानी है यह।
नादानियत की भी हद तोह देखो, यारों
टूटते तारों से उम्मीदें बाँधने चला था मैं।