May 31, 2008

उम्मीद

कुछ तारों के टुकड़े हाथ में लिए
फिर रहा हूँ कबसे;
मेरी उम्मीद की आखरी निशानी है यह।

नादानियत की भी हद तोह देखो, यारों
टूटते तारों से उम्मीदें बाँधने चला था मैं।

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