Dreams & Detritus
Some poems. A lot of purgatory.
May 31, 2008
एक मुलाक़ात
कल रात मैं मिला मुझसे;
पहचान होने में कुछ देर हुई।
शायद क्यूंकि टूटा था वोह
शायद क्यूंकि बिखरा था मैं।
या शायद क्यूंकि वजूद के दो अनजान हिस्से
अपने-अपने मुकद्दर की तलाश में मश्रूफ़ थे।
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